Aadhar Short Story – आधार – मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी

 

Aaadhar short story in Hindi आधार – मुंशी प्रेमचंद, के द्वारा लिखी गयी अनेको कहानियों में से एक हैं जो की बहुत ही मशहूर कहानी हुई.

यह कहानी एक मथुरा नाम के पहलवान की हैं जिसका कद-काठी लम्बा चौड़ा था गाँव में लोग उसकी बहुत मान सम्मान किया करते है,

मुंशी प्रेमचंद ने उस मथुरा पहलवान के चरित्र को बहुत ही अच्छे से लिखा हैं तो चलिये उनके द्वारा लिखी इस कहानी का अध्यन करते है | 

 

1. Aadhar Short Story By Munshi Premchand

 

भाग 1
सारे गॉँव मे मथुरा का सा गठीला जवान न था। कोई बीस बरस की उमर थी उसकी । मसें भीग रही थी। गाये चराता, दूध पीता, कसरत करता, कुश्ती लड़ता था और सारे दिन बांसुरी बजाता हाट मे विचरते रहता था।
शादी हो गया था, मगर अभी तक कोई बाल-बच्चा न था। घर में कई हल की खेती थी, कई छोटे-बडे भाई थे।
वे सब मिलजुलकर खेती-बारी किया करते थे। मथुरा पर सारे गॉँव को गर्व था, जब भी उसे जॉँघिये-लंगोटे, नाल या मुग्दर के लिए रूपये-पैसे की जरूरत परती तो तुरन्त दे दिये जाते थे।
सारे लोगों की यही अभिलाषा थी कि मथुरा पहलवान हो जाय और अपने विरोधी पहलवान को पछाड़ कर गांव का मान बढ़ाये। इस लाड – प्यार से मथुरा जरा टर्रा हो गया था।
गायें किसी के खेत मे पड़ी है और खुद अखाडे मे दंड लगा रहा होता है। कोई शिकायत करता तो उसकी त्योरियां बदल जाती। गरज कर कहता, जो मन मे आये कर लो, मथुरा तो अखाडा छोडकर गायें हांकने न जायेंगे !
पर उसका डील-डौल  शरीर देखकर किसी को भी उससे उलझने की हिम्मत न पड़ती। लोग गम खा के रह जाते.
आधार - मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी | Aaadhar
आधार – मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी | Aaadhar
गर्मियो के दिन आ गये थे, ताल-तलैया सभी सूखी पडी थी। चारो-तरफ जोरों की लू चलने लगी थी।
गॉँव में कहीं से एक सांड आ निकला और गउओं के साथ हो लिया, सारे दिन गउओं के साथ रहता, रात को बस्ती में घुस आता और खूंटो से बंधे बैलो को सींगों से मारता। कभी-किसी की गीली दीवार को सींगो से खोद डालता, घर का कूडा सींगो से उडाता।
कई किसानो ने साग-भाजी लगा रखी थी, सारे दिन बेचारे सींचते-सींचते मरते थे। और यह सांड रात को उन हरे-भरे खेतों में पहुंच जाता और खेत का खेत तबाह कर देता, लोग उसे डंडों से मारते, गॉँव के बाहर भगा आते, लेकिन जरा देर में गायों में पहुंच जाता।
किसी की अक्ल काम न करती थी कि इस संकट को कैसे टाला जाय। मथुरा का घर गांव के बीच मे था, इसलिए उसके खेतो को सांड से कोई हानि न पहुंचती थी। गांव में उपद्रव मचा हुआ था और मथुरा को तनिक भी चिन्ता न थी।
आखिरकर जब धैर्य का अंतिम बंधन टूट गया तो एक दिन सभी लोगों ने आपस में विचार विमर्श किया और फिर जाकर मथुरा से मिले और बौले—भाई, कहो तो गांव में रहें, या फिर कहीं तो निकल जाएं ।
जब खेती ही न बचेगी तो रहकर क्या करेगें ? तुम्हारी गायों के पीछे हमारा सत्यानाश हुआ जाता है, और तुम अपने रंग में मस्त हो। अगर भगवान ने तुम्हें बल दिया है तो इससे दूसरो की रक्षा करनी चाहिए, यह नही कि सबको पीस कर पी जाओ।
सांड तुम्हारी गायों के कारण आता है और उसे भगाना तुम्हारा काम है लेकिन तुम तो अपने कानो में तेल डाले बैठे हो, मानो तुम्हे कुछ मतलब ही नही। 
उनलोगो की बाते सुनके मथुरा को उनकी दशा पर दया आयी। बलवान मनुष्य प्राय: दयालु होता है। बोला—अच्छा जाओ, हम आज सांड को भगा देंगे।

एक आदमी ने कहा—दूर तक भगाना, नही तो फिर लोट आयेगा।

मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हुए उत्तर दिया—अब लौटकर न आयेगा वो सांड।
भाग 2 

चिलचिलाती दोपहरी थी। मथुरा सांड को भगाये लिए जाता था। दोंनो पसीने से तर बतर थे। सांड बार-बार गांव की ओर घूमने की चेष्टा करता, लेकिन मथुरा उसका इरादा तार कर दूर ही से उसकी राह छेंक लेता। सांड क्रोध से उन्मत्त होकर कभी-कभी पीछे मुडकर मथुरा के तरफ तोड करना चाहता लेकिन उस समय मथुरा सामने से बचकर बगल से ताबड-तोड इतनी लाठियां जमाता कि सांड को फिर भागना पडता कभी दोनों अरहर के खेतो में दौडते, कभी झाड़ियों में । अरहर की खूटियों से मथुरा के पांव लहू-लुहान हो रहे थे, झाडियों में धोती फट गई थी, पर उसे इस समय सांड का पीछा करने के सिवा और कोई सुध न थी। गांव पर गांव आते थे और निकल जाते थे। मथुरा ने निश्चय कर लिया कि इसे नदी पार भगाये बिना दम न लूंगा। उसका कंठ सूख गया था और आंखें लाल हो गयी थी, रोम-रोम से चिनगारियां सी निकल रही थी, दम उखड गया था लेकिन वह एक क्षण के लिए भी दम न लेता था। दो ढाई घंटो के बाद जाकर नदी आयी। यही हार-जीत का फैसला होने वाला था, यही से दोनों खिलाड़ियों को अपने दांव-पेंच के जौहर दिखाने थे।  

 

 

 
सांड सोचता था, अगर नदी में उतर गया तो यह मार ही डालेगा, एक बार जान लडा कर लौटने की कोशिश करनी चाहिए। मथुरा सोचता था, अगर वह लौट पडा तो इतनी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी और गांव के लोग मेरी हंसी उडायेगें। दोनों अपने – अपने घात में थे। सांड ने बहुत चाहा कि तेज दौडकर आगे निकल जाऊं और वहां से पीछे को फिरूं, पर मथुरा ने उसे मुडने का मौका न दिया। उसकी जान इस वक्त सुई की नोक पर थी, एक हाथ भी चूका और प्राण भी गए, जरा पैर फिसला और फिर उठना नशीब न होगा। आखिर मनुष्य ने पशु पर विजय पायी और सांड को नदी में घुसने के सिवाय और कोई उपाय न सूझा। मथुरा भी उसके पीछे नदी मे पैठ गया और इतने डंडे लगाये कि उसकी लाठी टूट गयी।
 
भाग 3 
 
अब मथुरा को जोरो से प्यास लगी। वह नदी किनारे बैठ गया और नदी में मुंह लगा दिया और इस तरह हौंक-हौंक कर पीने लगा मानो सारी नदी पी जाएगा। उसे अपने जीवन में कभी पानी इतना अच्छा न लगा था और न कभी उसने इतना पानी पीया था। मालूम नही, पांच सेर पी गया या दस सेर लेकिन पानी गरम था, प्यास न बुंझी जरा देर में फिर नदी में मुंह लगा दिया और इतना पानी पीया कि पेट में सांस लेने की जगह भी न रही। तब गीली धोती कंधे पर डालकर घर की ओर चल दिया।
 
लेकिन पांच दस कदम चला होगा कि पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा। उसने सोचा, दौड कर पानी पीने से ऐसा दर्द अकसर हो जाता है, जरा देर में दूर हो जाएगा। लेकिन दर्द बढने लगा और मथुरा का आगे जाना कठिन हो गया। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और दर्द से बैचेन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट को दबाता, कभी खडा हो जाता कभी बैठ जाता, पर दर्द बढता ही जाता था। अन्त में उसने जोर-जोर से कराहना और रोना शुरू किया पर वहां कौन बैठा था जो, उसकी खबर लेता। दूर-दूर तक कोई गांव नही, न आदमी न आदमजात। बेचारा दोपहरी के सन्नाटे में तड़प -तड़प कर मर गया।
 
हम कडे से कडा घाव सह सकते है लेकिन जरा सा-भी व्यतिक्रम नही सह सकते। वही देव का सा जवान जो कोसो तक सांड को भगाता चला आया था, तत्वों के विरोध का एक वार भी न सह सका। कौन जानता था कि यह दौड़ उसके लिए मौत की दौड़ होगी ! कौन जानता था कि मौत ही सांड का रूप धरकर उसे यों नचा रही है। कौन जानता था कि जल जिसके बिना उसके प्राण ओठों पर आ रहे थे, उसके लिए विष का काम करेगा।

संध्या समय उसके घरवाले उसे ढूंढते हुए आये। देखा तो वह अनंत विश्राम में मग्न था ऐसा लग रहा था मनो अभी अभी सोया हो।
 


एक महीना गुजर गया। गांव वाले अपने-अपने काम-धंधे में लग गये । घरवालों ने भी रो-धो कर सब्र किया, पर उस अभागिनी विधवा के आंसू कैसे पुंछते । वह हरदम रोती रहती। आंखे चांहे बन्द भी हो जाती, पर ह्रदय नित्य रोता रहता था। इस घर में अब कैसे निर्वाह होगा ? किस आधार पर जिऊंगी ? अपने लिए जीना या तो महात्माओं को आता है या लम्पटों ही को । अनूपा को यह कला क्या मालूम ? उसके लिए तो जीवन का एक आधार चाहिए था, जिसे वह अपना सर्वस्व समझे, जिसके लिए वह जीये, जिस पर वह घमंड कर सके । घरवालों को यह गवारा न था कि वह कोई दूसरा घर करे। इसमें बदनामी थी। इसके सिवाय ऐसी सुशील, घर के कामों में कुशल, लेन-देन के मामलो में इतनी चतुर और रंग रूप की ऐसी सराहनीय स्त्री का किसी दूसरे के घर पड जाना ही उन्हें असह्रय था। उधर अनूपा के मायके वाले एक जगह बातचीत पक्की कर रहे थे। जब सब बातें तय हो गयी, तो एक दिन अनूपा का भाई उसे विदा कराने आ पहुंचा।

 

 

अब तो घर में खलबली मच गई। इधर कहा गया, हम विदा न करेगें । भाई ने कहा, हम बिना विदा कराये मानेंगे नही। गांव के बड़े बुजुर्ग जमा हो गये, पंचायत होने लगी। यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड़ दिया जाय, जी चाहे रहे। यहां वालो को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने को राजी न होगी, दो-चार बार ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन उस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी विदाई का सामान होने लगा। डोली आ गई। गांव-भर की स्त्रिया उसे देखने आयीं। अनूपा उठ कर अपनी सांस के पैरो में गिर पडी और हाथ जोडकर बोली—अम्मा, कहा-सुनाद माफ करना। जी में तो था कि इसी घर में पड़ी रहूं, पर भगवान को ऐसा मंजूर नही है।
यह कहते-कहते उसकी जबान बन्द हो गई।

सास करूणा से विहृवल हो उठी। बोली—बेटी, जहां जाओं वहां सुखी रहो। हमारे भाग्य ही फूट गये नही तो क्यों तुम्हें इस घर से जाना पडता। भगवान का दिया और सब कुछ है, पर उन्होने जो नही दिया उसमें अपना क्या बस, बस आज तुम्हारा देवर सयाना होता तो बिगडी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी को अपना समझो पालो-पोसो बडा हो जायेगा तो सगाई कर दूंगी। 
 
यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लड़के वासुदेव से पूछा—क्यों रे ! भाभी से शादी करेगा ?
वासुदेव की उम्र पांच साल से अधिक न थी। अब उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला—तब तो दूसरे के घर न जायगी न ?
माँ —नही, जब तेरे साथ ब्याह हो जायगी तो क्यों जायगी ?
वासुदेव– तब मैं करूंगा
माँ —अच्छा, उससे पूछ, तुझसे ब्याह करेगी।
वासुदेव अनूप की गोद में जा बैठा और शरमाता हुआ बोला—हमसे ब्याह करोगी ?
यह कह कर वह हंसने लगा, लेकिन अनूप की आंखें डबडबा गयीं, वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली अम्मा, दिल से कहती हो ?
सास—भगवान् जानते है !
अनूपा—आज यह मेरे हो गये ?
सास—हां सारा गांव देख रहा है ।
अनूपा—तो भैया से कहला भैजो, घर जायें, मैं उनके साथ न जाऊंगी अब।
अनूपा को जीवन के लिए आधार की जरूरत थी। वह आधार मिल गया। सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है और सेवा ही उस के जीवन का आधार भी है।
अनूपा ने वासुदेव को लालन-पोषण शुरू किया। उबटन और तैल लगाती, दूध-रोटी मल-मल के खिलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी नहलाती। खेत में जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थौडे की दिनों में उससे हिल-मिल गया कि एक क्षण भी उसे न छोड़ता। मां को भूल गया। कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से मांगता, खेल में मार खाता तो रोता हुआ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती, अनूपा ही जगाती, बीमार हो तो अनूपा ही गोद में लेकर बदलू वैध के घर जाती, और दवायें पिलाती।

गांव के स्त्री-पुरूष उसकी यह प्रेम तपस्या देखते और अपने दांतो उंगली दबाते। मगर शायद ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते थे, साल-दो-साल में इसका जी ऊब जाएगा और फिर किसी तरफ का रास्ता लेगी, इस दुधमुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेगी लेकिन यह सारी आशंकाएं निमूर्ल निकलीं। अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न देखा। जिस ह्रदय मे सेवा को स्रोत बह रहा हो—स्वाधीन सेवा का—उसमें वासनाओं के लिए कहां स्थान ? वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में ही चलती है, उजाले में नही।

 

 

वासुदेव को भी कसरत का खूब शोक था। उसकी शक्ल सूरत मथुरा से थोड़ी मिलती-जुलती थी, डील-डौल भी वैसा ही था। उसने फिर अखाडा जगाया और उसकी बांसुरी की तानें फिर खेतों में गूजने लगीं। इसी तरह 13 साल गुजर गये। वासुदेव और अनूपा में सगाई की तैयारी होने लगीं।

 

भाग 4 

धीरे धीरे समय बीतता गया लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसने 14 वर्ष पहले वासुदेव को पति भाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृभाव ने लिया था। इधर कुछ दिनों से वह एक गहरे सोच में डूबी रहती थी। सगाई के दिन ज्यो-ज्यों निकट आ रहे थे, उसका दिल बैठा जाता था। अपने जीवन में इतने बडे परिवर्तन की कल्पना ही से उसका कलेजा दहक उठता था। जिसे बालक की भॉति पाला-पोसा, उसे पति बनाते हुए, लज्जा से उसका मुंख लाल हो जाता था।

 

द्वार पर नगाडा बज रहा था। गाँव बिरादरी के लोग जमा थे। घर में गाना हो रहा था ! आज सगाई की तिथि थी |
सहसा अनूपा ने जा कर सास से कहा—अम्मां मै तो लाज के मारे मरी जा रही हूं।
सास ने भौंचक्की हो कर पूछा—क्यों बेटी, क्या हुआ ?
अनूपा—मैं सगाई न करूंगी।

सास—कैसी बात करती हो बेटी ? सारी तैयारी पूरी हो गयी अगर लोग सुनेंगे तो क्या कहेगें ?
अनूपा—जो चाहे कहें, जिनके नाम पर  14 वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी।
मैंने समझा था मरद के बिना औरत से रहा न जाता होगा। मेरी तो भगवान ने इज्जत आबरू निबाह दी। जब नयी उम्र के दिन कट गये तो अब कौन चिन्ता है !
वासुदेव की सगाई कोई अच्छी लड़की खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला है उसी तरह अब उसके बाल-बच्चों को पालूंगी।

 

‘मुंशी प्रेमचंद’

 

विकिपीडिया के संदर्भ से

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